I believe in the imagination. What I cannot see is infinitely more important than what I can see.

Friday, November 7, 2008

शख़्सियत

अल्फ़ाज़ों मैं वो दम कहाँ जो बया करे शख़्सियत हमारी,
रूबरू होना है तो आगोश मैं आना होगा ,
यूँ देखने भर से नशा नहीं होता जान लो साकी,
हम इक ज़ाम हैं हमें होंठो से लगाना होगा ......
हमारी आह से पानी मे भी अंगारे दहक जाते हैं ;
हमसे मिलकर मुर्दों के भी दिल धड़क जाते हैं ..
गुस्ताख़ी मत करना हमसे दिल लगाने की साकी ;
हमारी नज़रों से टकराकर मय के प्याले चटक जाते हैं

1 comment:

chirag said...

nice one yaar
see my blog also
u can find some poems there also that was written by me
http://iamhereonlyforu.blogspot.com

LinkWithin

Blog Widget by LinkWithin