I believe in the imagination. What I cannot see is infinitely more important than what I can see.

Sunday, April 26, 2009

उम्मीद की किरण


गम जीवन में हरदम नही होते

है मानव स्वाभाव ऐसा कि

उम्मीदों की किरणे मध्यम नही होतीं।

पर होता है कष्ट जब कोई उम्मीद बंधाये

और चलती हुयी राह पर

संग आपका छोड़ जाए।

तब ना मंजिल सूझती है

ना वापिसी का रास्ता

और दे कर, जाने वाले को

इंसानियत का वास्ता,

उसे वापिस बुलाने की

पुरजोर कोशिश होती है

जो कभी सफल तो कभी

असफल होती है।

फिर जब टूटता है उम्मीदों का बाँध

बिखर जाता है इंसान

तब इस घने अन्धकार से

एक उम्मीद की किरण ही पार लगाती है

और हमारे जीवन को एक नई दिशा मिल जाती है।

6 comments:

gargi gupta said...

बहुत खूब.......अच्छी रचना.....
aisa laga ki hamare vichar or aap ke shawd

dhanyabad

vandana said...

ummeed par hi to duniya kayam hai.

SAHITYIKA said...

dhanyawad gargi ji..
meri rachna me aapne apne bhavo ko paya.. isase badh kar compliment kya ho sakta hai..

Sneha said...

behot hee badiyah.aur sabsey badiyah baat jou hai ki tumney saral hindi use ki hai jo rachna kou aur khubsurat bena rehi hai.:)

रवीन्द्र दास said...

achchhi rachna.... vaah!

भूतनाथ said...

waah kyaa baat kah dee tumne....mazaa aa gaya.. isi tarah doob-doob kar likhti raho....!!

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